Chinmay Singh

निशाँ नहीं

July 3, 2018 · Poems

शहर बसता था यहाँ पर कभी,
सुबह-सुबह समंदर आया,
अब कोई निशाँ नहीं

फिर रात भर बारिश हुई,
सुबह सूरज निकल आया,
अब कोई निशाँ नहीं

रात भर रोया बुग्याल,
सुबह यूँ मुस्कुराया,
अब कोई निशाँ नहीं